ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने अमेरिका से बातचीत पर विरोधियों को क्यों लताड़ा

ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने अमेरिका से बातचीत पर विरोधियों को क्यों लताड़ा

ईरान की राजनीति में इस समय जो कुछ चल रहा है, उसने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया है। अमेरिकी अधिकारियों के साथ चल रही बैक-चैनल डिप्लोमेसी पर देश के भीतर ही घमासान मचा हुआ है। कट्टरपंथियों ने सरकार को घेरना शुरू किया तो राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने भी चुप्पी तोड़ दी। उन्होंने साफ कर दिया कि अमेरिका के साथ चल रही बातचीत कोई चोरी-छिपे लिया गया फैसला नहीं है। यह देश की सुरक्षा और तरक्की से जुड़ा एक सोचा-समझा कदम है।

विरोधियों को सीधा जवाब देते हुए पेजेशकियन ने साफ कहा कि बातचीत की हर कूटनीतिक चाल देश के तय ढांचे के तहत ही चली जा रही है। ईरान के नए सर्वोच्च नेता मुजतबा खामेनेई के रणनीतिक मार्गदर्शन में ही सब कुछ हो रहा है। उन्होंने साफ लहजे में आलोचकों को आईना दिखाया कि अगर नेतृत्व ने बातचीत न करने का आदेश दिया होता, तो हम कभी टेबल पर नहीं बैठते।

कट्टरपंथियों के दावों की हवा निकाली

ईरान के भीतर दक्षिणपंथी और कट्टरपंथी गुट लगातार यह माहौल बना रहे थे कि पेजेशकियन सरकार बिना किसी धार्मिक या सर्वोच्च मंजूरी के अमेरिका के सामने झुक रही है। इन आलोचकों ने बातचीत में शामिल टीम को 'धर्म-विरोधी' और 'गद्दार' तक कह डाला। राष्ट्रपति ने इन आरोपों पर सीधा पलटवार किया। उन्होंने इस्लामिक डेवलपमेंट कोआर्डिनेशन काउंसिल की बैठक में देश के सामने आंकड़े रख दिए।

पेजेशकियन ने खुलासा किया कि यह बातचीत सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल (SNSC) के पास भेजी गई थी। सर्वोच्च नेता का निर्देश था कि अगर काउंसिल के तीन-चौथाई सदस्य इसके पक्ष में वोट करते हैं, तभी कूटनीतिक रास्ता चुना जाए। नतीजा क्या रहा? काउंसिल के 13 में से 12 सदस्यों ने न सिर्फ इसके पक्ष में मतदान किया, बल्कि इस पर खुलकर चर्चा की और इसका समर्थन किया। यह कोई आम सहमति नहीं, बल्कि एक भारी बहुमत था जिसने आलोचकों के दावों की हवा निकाल दी।

आंतरिक कलह और विदेशी दबाव

ईरान इस समय एक बेहद नाजुक मोड़ से गुजर रहा है। पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन के बाद देश में सत्ता का बदलाव हुआ है। ऐसे समय में जब देश राजकीय शोक और अंतिम संस्कार की तैयारियों में जुटा है, तब बैक-चैनल कूटनीति का चालू रहना कई लोगों को खटक रहा है। लेकिन सरकार का मानना है कि देश की अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए यह सबसे सही समय है।

खाड़ी क्षेत्र और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जारी तनाव के बीच व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा दुनिया के लिए बड़ा सिरदर्द बनी हुई है। कतर और पाकिस्तान इस बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं। दोहा में दोनों पक्षों के बीच लगातार तकनीकी दौर की बैठकें हुई हैं। कतर के विदेश मंत्रालय ने भी माना है कि इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) के 14 बिंदुओं पर सकारात्मक प्रगति हुई है। स्विट्जरलैंड के ल्यूसर्न समिट के बाद शुरू हुआ यह सिलसिला अब एक ठोस समझौते की तरफ बढ़ रहा है।

देश के हितों से कोई समझौता नहीं

पेजेशकियन ने साफ किया कि बातचीत का मतलब यह कटई नहीं है कि ईरान अपने मूल सिद्धांतों या राष्ट्रीय अधिकारों से पीछे हट रहा है। सरकार का मकसद सिर्फ कूटनीति के जरिए देश पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों से राहत पाना है। हाल ही में कतर में मौजूद 6 अरब डॉलर के ईरानी फंड को जारी करने की बात भी सामने आई है। यह फंड ईरान की चरमराती अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी जैसा साबित हो सकता है।

आलोचक भले ही इसे कमजोरी बताएं, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। आम जनता महंगाई और पाबंदियों से परेशान है। राष्ट्रपति इसी जनता को राहत देने की कोशिश में जुटे हैं। उन्होंने साफ कहा कि कुछ गुट दुश्मन मीडिया के मनोवैज्ञानिक हथकंडों के जाल में फंसकर देश के ही फैसलों पर सवाल उठा रहे हैं, जिससे देश कमजोर होता है।

अब देखना यह होगा कि राजकीय अंतिम संस्कार की प्रक्रियाओं के बाद जब दोहा में अगले दौर की बातचीत शुरू होगी, तो ईरान की बातचीत टीम देश के भीतर के इस राजनीतिक गतिरोध को कैसे संभालती है। सरकार को हर कदम फूंक-फूंक कर रखना होगा क्योंकि जरा सी चूक घरेलू राजनीति में उनके लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकती है।

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Scarlett Taylor

A former academic turned journalist, Scarlett Taylor brings rigorous analytical thinking to every piece, ensuring depth and accuracy in every word.