धरती जब कांपती है तो सिर्फ कंक्रीट नहीं टूटता

धरती जब कांपती है तो सिर्फ कंक्रीट नहीं टूटता

सुबह के ठीक पांच बजकर बयालीस मिनट हुए थे। कारकास की हवा में हमेशा रहने वाली कॉफी और नमी की महक अभी घुली ही थी कि जमीन ने करवट ले ली। वह कोई मामूली थरथराहट नहीं थी। वह एक आदिम, गहरी गड़गड़ाहट थी जो पैरों के तलवों से होती हुई सीधे रीढ़ की हड्डी में उतर गई। बर्तन गिरे। कंक्रीट की दीवारें ऐसे लहराईं जैसे कागज के पन्ने हों। और फिर, सब कुछ ठहर गया।

लेकिन यह सिर्फ शुरुआत थी। जब तक लोग संभलते, ठीक चौबीस घंटे के भीतर दूसरे झटके ने रही-सही कसर पूरी कर दी। वेनेजुएला, जो पहले से ही आर्थिक और सामाजिक मोर्चों पर एक खामोश जंग लड़ रहा था, दो लगातार आए भूकंपों के मलबे के नीचे दब गया। Meanwhile, you can find other developments here: The Deadly Theater of Post Disaster Search and Rescue.

अखबारों की सुर्खियां कहेंगी कि 920 लोगों की जान चली गई। वे कहेंगे कि 3,000 से ज्यादा लोग अस्पतालों में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। वे आंकड़े बताएंगे। वे ग्राफ दिखाएंगे। लेकिन आंकड़े कभी रोते नहीं हैं। आंकड़े मलबे के नीचे से अपनी मां को आवाज नहीं देते। जब हम इतनी बड़ी त्रासदी को सिर्फ नंबर्स में तब्दील कर देते हैं, तो हम उस दर्द की तासीर खो देते हैं जो इस वक्त वेनेजुएला की गलियों में बह रहा है।

मलबे के नीचे का भूगोल

मान लीजिए एक पल के लिए आप मारिया हैं। मारिया कोई काल्पनिक नाम नहीं है, वह इस त्रासदी में फंसी हर उस मां, हर उस बेटी का चेहरा है जो इस वक्त काराकास या मलबे से पटे शहरों की सड़कों पर बैठी है। मारिया अपनी छह साल की बच्ची के लिए दूध गर्म कर रही थी जब रसोई की छत नीचे आ गिरी। मारिया बच गई, लेकिन उसकी दुनिया वहीं ठहर गई। अब वह अपने हाथों से, बिना किसी फावड़े या क्रेन के, कंक्रीट के भारी टुकड़ों को हटा रही है। उसके नाखूनों से खून बह रहा है, लेकिन उसे दर्द का अहसास नहीं है। उसे बस एक आवाज सुननी है। एक हल्की सी सिसकी। To see the full picture, check out the excellent analysis by The New York Times.

यही वह मानवीय पहलू है जो आपदा की खबरों से अक्सर गायब हो जाता है। जब कोई भूकंप आता है, तो वह सिर्फ इमारतों को नहीं गिराता। वह परिवारों के इतिहास को, बरसों की जमा-पूंजी को और आने वाले कल के सपनों को एक झटके में मटियामेट कर देता है। हजार से ज्यादा लोग अब भी लापता हैं। लापता होने का मतलब समझते हैं? यह मौत से भी बदतर एक कशमकश है, जहां आप न तो शोक मना सकते हैं और न ही उम्मीद छोड़ सकते हैं।

मलबे के नीचे दबा हुआ हर एक इंसान एक अधूरी कहानी है। किसी को अपनी नौकरी के पहले दिन जाना था, किसी की शादी होने वाली थी, तो कोई बस अपने पोते का चेहरा देखने की आस में था।

जब भूगोल बदलता है तो इतिहास काम आता है

वेनेजुएला की इस कराह को दुनिया ने सुना है। जब आपके पास खुद के साधन सीमित हों, तो अंतरराष्ट्रीय मदद सिर्फ एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं रह जाती, वह जीवन रेखा बन जाती है। इस संकट की घड़ी में भारत ने अपनी तरफ से मदद का हाथ बढ़ाया है। राहत सामग्री, दवाइयां और बचाव दल की खेप दिल्ली से रवाना हो चुकी है।

यह कोई नया गठजोड़ नहीं है। संकट के समय हाथ बढ़ाना भारत की उस सनातनी सोच का हिस्सा है जिसे हम वसुधैव कुटुंबकम कहते हैं। जब नेपाल में भूकंप आया था, तब भी भारतीय राहत दल सबसे पहले पहुंचने वालों में से था। तुर्किये की तबाही में भी भारत ने 'ऑपरेशन दोस्त' चलाया था। आज वही भावना वेनेजुएला के लिए उमड़ रही है। सात समंदर पार से आ रही यह मदद केवल दवाओं के डिब्बे नहीं हैं, यह एक भरोसा है कि इस अंधेरी रात में वेनेजुएला अकेला नहीं है।

लेकिन क्या केवल मदद भेज देना काफी है?

बचाव कार्य की असल चुनौती कंक्रीट को हटाने के बाद शुरू होती है। मलबे से निकाले गए घायल लोगों के शरीर पर आए जख्म तो हफ्तों में भर जाएंगे, लेकिन जो मानसिक आघात उनके जेहन पर छप गया है, उसे मिटाने में दशक लगेंगे। डॉक्टरों का कहना है कि मलबे से जिंदा बचे लोगों में से कई अब भी सदमे के कारण बोल नहीं पा रहे हैं। वे बस शून्य में ताकते रहते हैं, मानो उनके भीतर का कुछ बहुत कीमती हमेशा के लिए टूट गया हो।

एक खामोश चीख जो सुनी जानी चाहिए

हॉस्पिटलों के बाहर का नजारा दिल दहला देने वाला है। स्ट्रेचर कम पड़ गए हैं, इसलिए घायलों को फर्श पर गद्दे बिछाकर प्राथमिक उपचार दिया जा रहा है। डॉक्टरों की टीमें बिना सोए, बिना रुके लगातार ऑपरेशन कर रही हैं। दवाइयों की कमी एक बड़ी चुनौती है, और यहीं पर भारत से भेजी जा रही मेडिकल सप्लाई गेम को पूरी तरह बदल सकती है। एंटीबायोटिक्स, दर्द निवारक दवाएं और सर्जिकल टूल्स इस वक्त वहां सोने से भी ज्यादा कीमती हैं।

यह आपदा हमें एक बहुत कड़वा सबक भी सिखाती है। कुदरत जब अपना रौद्र रूप दिखाती है, तो वह अमीर और गरीब में फर्क नहीं करती। कंक्रीट के बड़े-बड़े अपार्टमेंट्स और झुग्गियां, दोनों एक ही तरह से ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं। लेकिन आपदा के बाद का जो दंश होता है, उसकी मार सबसे ज्यादा समाज के निचले तबके पर पड़ती है। जिनके पास कोई बीमा नहीं है, कोई बैंक बैलेंस नहीं है, उनका पुनर्वास कैसे होगा?

बचावकर्मी अब भी उन इलाकों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं जो पहाड़ी रास्तों के टूटने के कारण पूरी दुनिया से कट गए हैं। वहां क्या स्थिति है, कोई नहीं जानता। हर गुजरते घंटे के साथ मलबे के नीचे दबे लोगों के जिंदा बचने की उम्मीदें धुंधली होती जा रही हैं। फिर भी, मलबे के ऊपर खड़े लोग हार मानने को तैयार नहीं हैं। वे अपने खाली हाथों से मिट्टी खोद रहे हैं।

एक बूढ़ा आदमी मलबे के एक ढेर के पास बैठा है। उसके हाथ में एक फटी हुई गुड़िया है। वह रो नहीं रहा। उसकी आंखें सूख चुकी हैं। वह बस उस जगह को देख रहा है जहां कभी उसका घर हुआ करता था, जहां कभी हंसी गूंजती थी। हवा का एक झोंका आता है और उसके चेहरे पर जमी कंक्रीट की धूल को उड़ा ले जाता है, लेकिन उस मलबे के नीचे दबी उसकी पूरी जिंदगी की यादों को कोई हवा नहीं मिटा सकती।

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Isabella Edwards

Isabella Edwards is a meticulous researcher and eloquent writer, recognized for delivering accurate, insightful content that keeps readers coming back.